Category Archives: Real-Life

JRfmlFt

Diving Bell

When I was a little kid my father took me to a very old library. Rummaging through the damp shelf I saw a book titled world’s greatest inventions . I flipped through it trying to absorb as much as I could, even the dreary black and white pictures excite you at that age. It was only until I reached the sea explorations chapter that my excitement lasted.

What captivated me and consolidated all my fears was the image of a diving bell, well a diving bell ‘helmet’ to be precise. Even years later I couldn’t get that particular picture out of my head and that fear of closed space and water comes rushing back to me till it drips away through my clutched fingers.

And as my days goes by it dawns on deeper everyday that my life may have actually become a diving bell which has abruptly lost contact with rest of the crew. Though I haven’t realized the subtle certainty of ‘Death’ as long as I have some air left I am soaking the sublime beauty of the ocean. It turns from azure to a threatening midnight blue and the day when I run out of oxygen and the heavy apparatus bring me down to the very bottom, I will have an epiphany that the very thing that kept me alive, is about to kill me. And then it will  be too late and I will be gone without a trace. Thus, years later that dreaded monochrome picture will have had the better of me.

JRfmlFt

vinay kuchhal

किराने की दुकान

कल बड़े दिनो बाद बज़ार के लिये निकला। यूँ तो आना जाना लगा रहता है पर supermarket की तरफ कम जाता हूँ। वो department मेरी बीवी और बड़ा लड़का सँभालते हैं , क्यूंकि मेरे को supermarket ज़रा कम ही समझ में आते हैं। मैं ठहरा पुराने विचारों वाला आदमी , वही किराने की दुकान जहाँ जाने के लिए एक दम tip top दिखने की जरुरत नहीं पड़ती। बड़े शहरों में तो जैसे विलुप्त होती प्रतीत होती है ये दुकाने|

मेरे छोटे से शहर में इतनी सारी किराने की दुकाने थी , किसी ने जुगनूं छोड़ दिए हो जैसे। शहर की हर बात, वारदात, खबरें , रोज़मर्रा की चटर पटर इन्ही दुकानो से गुजरती हुयी लोगों के घरों तक पहुँचती थी। शहर में कभी दंगा होता था तो माँ कहती थी, “ज़रा पूछ के आ अगरवाल जी से आज शहर में कुछ हुआ है क्या?”
अग्रवाल जी बड़े अच्छे से जानते थे हम सबको , क्या बच्चा क्या जवान। उन्ही की आँखों के सामने ही तो हम सब बड़े हुए। जहां एक तरफ supermarket में salesmen होते हैं आपकी मदद करने के लिए जो की आपसे बड़ी विनम्रता से पेश आते हैं , लेकिन आपके अंतर मन को जाने क्यों वो बनावटी मालूम होती है। वही एक तरफ अग्रवाल जी थे , हम उनके counter तक भी नहीं पहुँचते थे मगर वो बस हमारा सिर देख कर समझ जाते थे कि कौन है और क्या चाहिए। हमें याद है एक बार माँ ने जीरा मंगाया था , हम जीरा-जीरा की रट लगाये जा रहे थे की बीच रास्तें में कंचों के खेल में अटक गए , दूकान पर जाकर जीरो माँगा और घर आकर जीरे का पैकेट माँ को थमाया। ग्राहक किसी भी उम्र का हो , अग्रवाल जी को उसकी पसंद, नापसंद दिल से याद रहती थी.

अब बूढ़े हो चले हैं अग्रवाल जी , लेकिन अब भी जब मेरा छोटा लड़का अपनी दादी से पैसे लेकर अग्रवाल जी की दूकान पर टॉफ़ी , चॉक्लेट खरीदने जाता है तो वो अपने मोटे चश्मे से उसके नन्हे हाथों और सिर को स्कैन कर के कहते हैं , “तू रमेश का लड़का हैं ना ? यह ले तेरे पापा को भी यही पसंद थी ”

शहर में रहता हूँ तो अक्सर अपने को ये सोचता पता हूँ की अग्रवाल जी के जाने के बाद क्या कोई याद रखेगा इतने ढंग से,

की मुझे कौन सी चॉकलेट पसंद थी?

photo by santosh wadghule